अहिक्षेत्र पार्श्वनाथ अर्घ | sangharsho me upsarago me
संघर्षों में उपसर्गों में, तुमने समता का भाव धरा।
आदर्श तुम्हारा अमृत-बन, भक्तों के जीवन में बिखरा।।
मैं अष्ट द्रव्य से पूजा का, शुभ थाल सजा कर लाया हूँ।
जो पदवी तुमने पाई है, मैं भी उस पर ललचाया हूँ।
अथवा
संघर्षों में उपसर्गों में, तुमने समता का भाव धरा।
आदर्श तुम्हारा अमृत-बन, भक्तों के जीवन में बिखरा।।
जो पथ तुमने अपनाया है, वह सीधा शिव को जाता है।
जो इस पथ का अनुयायी है, वह परम मोक्ष पद पाता है।
ॐ ह्रीं श्रीअहिच्छत्रपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घं नि. स्वाहा।
अथवा
नीर गंध अक्षतान, पुष्प चारु लीजिये ।
दीप धूप श्रीफलादि, अर्घ तैं जजीजिये ।।
पार्श्वनाथ देव सेव, आपकी करुं सदा ।
दीजिए निवास मोक्ष, भूलिये नहीं कदा ।।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये-अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
हम भगवान पारसनाथ की पूजा करते हुये कहते हैं संघर्षों में उपसर्गो में, तुमने समता का भाव धरा। भगवान पार्श्वनाथ से हमें समता धारण करने की, क्षमा भाव को धारण करने की शिक्षा लेनी चाहिये, यदि हमसे कोई दो बातें कह देता है तो हम क्रोध से भर जाते हैं। और जीवन भर के लिये उससे बैर धारण करने को तैयार हो जाते हैं। भगवान पार्श्वनाथ ने उपसर्ग सहन करते हुये केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। भगवान पार्श्वनाथ उपसर्ग विजयी पार्श्वनाथ बन गये।
- मुनि सुयश सागर जी
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